शिक्षा, साहित्य और संगीत की साधिका पुष्पा माथुर का निधन



आरा:- आरा की शैक्षणिक, सांस्कृतिक और संगीत परंपरा को दशकों तक संस्कारित करने वाली वरिष्ठ शिक्षिका, संगीत साधिका और संवेदनशील व्यक्तित्व पुष्पा माथुर का मंगलवार की शाम 83 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन से शिक्षा जगत, साहित्यिक-सांस्कृतिक समाज और उनके शिष्यों में शोक की लहर है। पुष्पा माथुर को बच्चे केवल शिक्षिका या प्रधानाचार्या के रूप में नहीं, बल्कि एक मां के रूप में जानते थे। बच्चों के प्रति उनका स्नेह गहरा था, लेकिन अनुशासन के साथ। उनका मानना था कि स्नेह और अनुशासन एक-दूसरे के पूरक हैं। वर्ष 2004 में आरा के जवाहर टोला स्कूल से प्रधानाचार्या पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका शिक्षा से जुड़ाव जीवनपर्यंत बना रहा।

सेवानिवृत्ति के बाद वे अपने पति, वरिष्ठ साहित्यकार स्व. रणजीत बहादुर माथुर के साथ अप्रत्यक्ष रूप से साहित्य-सेवा में संलग्न रहीं। मंचों से दूर रहते हुए भी उनका मार्गदर्शक योगदान आरा की रचनात्मक और सांस्कृतिक चेतना को निरंतर ऊर्जा देता रहा। 1960 के दशक में गायन और विशेष रूप से सितार वादन के क्षेत्र में उनकी सक्रियता उल्लेखनीय रही। बिहार के विभिन्न हिस्सों में उनके संगीत-प्रदर्शनों ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति नई पीढ़ी में रुचि जगाने में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। अनेक सम्मानों से विभूषित पुष्पा माथुर की संगीत साधना बिहार के तत्कालीन राज्यपाल द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी सराही गई। पटना स्थित गुरु गोविंद सिंह स्कूल में लंबे समय तक संगीत शिक्षिका के रूप में उनका योगदान स्मरणीय है। उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा पटनासिटी के प्रसिद्ध गुरु हरिनारायण कपूर से प्राप्त की थी। आरा और भोजपुर क्षेत्र के कई प्राथमिक विद्यालयों में उन्होंने केवल पाठ्यक्रम ही नहीं पढ़ाया, बल्कि बच्चों में संस्कार, सौंदर्यबोध और अनुशासन का बीजारोपण किया। एक अनुशासनप्रिय शिक्षिका और संवेदनशील प्रधानाचार्या के रूप में उन्हें बच्चों और अभिभावकों—दोनों का समान सम्मान प्राप्त था। आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों की शिक्षा के लिए उन्होंने चुपचाप तन–मन–धन से सहयोग किया, जो कभी प्रचार का विषय नहीं बना। उनकी हिंदी भाषा की मिठास केवल शब्दों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनके व्यवहार में भी झलकती थी। शायद इसी कारण अनेक बच्चे उन्हें दादी या नानी नहीं, बल्कि “मां” कहकर संबोधित करते थे। मंगलवार की शाम उनके निधन के बाद उनका अंतिम संस्कार किया गया। उन्हें मुखाग्नि सावन कुमार ने दी। इस अवसर पर समाज के कई गणमान्य लोग, साहित्यकार, शिक्षाविद और शुभचिंतक उपस्थित रहे।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हमारे चैनल में आपका स्वागत है, खबरों व विज्ञापन के लिए संपर्क करें -+91 7903628633,9470079625
error: Content is protected !!