जब अधिकांश लोग नींद की आगोश में थे, तब भी संतोष जी जाग रहे थे।
और जब सर्द रातों में लोग अपने-अपने गर्म कमरों में विश्राम कर रहे थे, तब भी संतोष जी जाग रहे थे।
लेकिन यह जागना सिर्फ आँखों का नहीं था—
यह जागना मन, संकल्प और दायित्व-बोध का था।
क्योंकि भागलपुर की इस पावन धरती पर WJAI के ऐतिहासिक आयोजन को आकार देने का भार उन्होंने अपने कंधों पर उठा लिया था।

यह कोई सामान्य जिम्मेदारी नहीं थी—
यह एक ऐसी साधना थी, जिसमें नींद त्यागनी पड़ती है,
और अतिथियों के सम्मान को अपने आराम से ऊपर रखना पड़ता है।
हमने स्वयं देखा—
कैसे कभी रेलवे स्टेशन तो कभी बस स्टैंड पर
अतिथियों की प्रतीक्षा में वे खड़े रहे।
सिर्फ उन्हें उनके गंतव्य तक पहुँचाना ही नहीं,
बल्कि उसी धरती पर अंगवस्त्र भेंट कर
भागलपुर की सांस्कृतिक विरासत और आतिथ्य परंपरा का स्मरण कराते रहे—

कि “आपका स्वागत इस अंग प्रदेश की पुण्यभूमि पर है।”
कल रात्रि, जब मैं मिथिलेश मिश्रा और आज़ाद कुमार भारती के साथ
देर रात भागलपुर पहुँचा और आनंद उत्सव स्थल आया,
तो स्वागत में मंजेश जी और आनंद भैया उपस्थित थे।
उनकी मुस्कान, उनका स्नेह और उनकी तत्परता—
थकान को जैसे पल भर में हर ले गई।
कमरा मिलते ही मन सचमुच आनंद से भर उठा।
रात्रि का प्रहर बढ़ता गया…
घड़ी की सुइयाँ जब तीन बजे के करीब पहुँचीं,
तो मंजेश जी ने कहा—
“संजय दिवेदी सर आ रहे हैं, जाना होगा।”
मैंने कहा—
“मैं आ चुका हूँ, मैं चला जाऊँगा।”
लेकिन संतोष जी—
वे कहाँ रुकने वाले थे।
उन्होंने स्वयं आगे बढ़कर
संजय दिवेदी सर को सम्मान सहित
उत्सव भवन तक लाया।
और सिर्फ संजय सर ही नहीं—
हर आगंतुक के स्वागत में
वे प्रहरी की तरह खड़े रहे।
यही दृश्य हमने
मंजेश जी और
बड़े भैया आनंद कौशल जी में भी देखा।
पूरी रात—
बिना थके, बिना शिकायत—
अतिथियों के आगमन की प्रतीक्षा करते रहे।
पटना से देर रात मधुप मनी जी का आगमन हो,
छपरा से अमित सर का,
या फिर कलकत्ता से लेकर राजस्थान तक के सम्मानित अतिथियों का—
रात्रि भर आगमन का सिलसिला चलता रहा।
कहा जाता है—
कोई भी बड़ा कार्यक्रम करना आसान नहीं होता।
उसके लिए मंच से पहले
प्रहरी बनकर जागना पड़ता है।
और इस आयोजन में—
हमने देखा, महसूस किया और सीखा—
कि कर्तव्यबोध वही है, जो नींद से पहले जिम्मेदारी को चुन ले।




